दिल्ली में 300 घर क्यों सील किए गए? मस्जिद कॉलोनी, पीर मोहल्ला और यूपी सिंचाई विभाग का पूरा विवाद
दिल्ली के आली गांव स्थित मस्जिद कॉलोनी में दिसंबर से जो हो रहा है, वह सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं बल्कि सैकड़ों गरीब परिवारों के अस्तित्व का सवाल बन चुका है। यूपी सिंचाई विभाग की कार्रवाई के बाद यहां करीब 300 मकानों को सील कर दिया गया, जिससे महिलाएं, बच्चे, बुज़ुर्ग और गर्भवती महिलाएं सर्दी में सड़क पर रहने को मजबूर हैं।
बिना नोटिस कैसे हुई कार्रवाई?
32 साल की शबाना, जिनका घर 15 दिसंबर को सील किया गया, बताती हैं कि प्रशासन ने कोई नोटिस नहीं दिया। अफसर पुलिस और मजदूरों के साथ आए, सामान बाहर फेंकवाया और घर पर ताला लगा दिया। बच्चे स्कूल से लौट रहे थे और यह सब देखकर रोने लगे।
शबाना का सवाल है – जब आधार कार्ड, वोटर कार्ड, बिजली-पानी का कनेक्शन सब है तो हमें अचानक बेघर कैसे किया जा सकता है?
महिलाओं और बच्चों की हालत
कॉलोनी में पानी, टॉयलेट और बिजली सब काट दी गई है। 23 साल की ज्योति आठ महीने की गर्भवती हैं, उन्हें बार-बार टॉयलेट की जरूरत होती है लेकिन घर सील होने से भारी दिक्कत हो रही है। 60 साल की शमीना अपने 18 सदस्यों वाले परिवार के साथ सड़क किनारे रह रही हैं। नवजात बच्चे और बुज़ुर्गों को रिश्तेदारों के यहां भेजना पड़ा है।
मदरसा भी सील, इमाम का आरोप
मस्जिद के पास बने मदरसे को भी सील कर दिया गया। इमाम का आरोप है कि 500 से ज्यादा अधिकारी बिना नोटिस आए, पानी की सप्लाई तोड़ दी गई और विरोध करने पर पुलिस ने बदसलूकी की।
पढ़ाई पर असर
10वीं में पढ़ने वाला आकिब, जो शारीरिक रूप से दिव्यांग है, बताता है कि बिजली नहीं होने से पढ़ाई नहीं हो पा रही। बोर्ड परीक्षा सिर पर है लेकिन हालात ऐसे हैं कि स्कूल जाना भी मुश्किल हो गया है।
यूपी सिंचाई विभाग का दावा
यूपी सिंचाई विभाग का कहना है कि आली गांव की पोस्ता रोड से सटी 8.48 एकड़ जमीन उनकी है और दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर सीलिंग की गई है। विभाग के अनुसार जमीन पर अवैध कब्जा है।
लोगों का पलटवार
स्थानीय लोगों का दावा है कि यह बस्ती 100–200 साल पुरानी है। कई परिवार 5–7 पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं। 2004 में यूपी सिंचाई विभाग ने जितनी जमीन लेनी थी, वह ले चुका था। उसके बाद नया दावा लोगों के लिए मुसीबत बन गया।
कोर्ट में मामला
इस केस की सुनवाई दिल्ली के साकेत कोर्ट में चल रही है। 13 जनवरी को अहम सुनवाई होनी है। वकील अनुज कुमार गर्ग के मुताबिक, लिमिटेशन एक्ट 1963 के तहत अगर कोई व्यक्ति सरकारी जमीन पर 30 साल से अधिक समय से रह रहा है और सरकार को जानकारी है, तो मामला एडवर्स पजेशन में आ सकता है।
हाई कोर्ट ने सभी पक्षों को आपस में बैठकर समाधान निकालने के निर्देश दिए हैं। अब केस में दिल्ली सरकार, एलजी, डीडीए और केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाया गया है।
बड़े सवाल
बिना नोटिस घर सील करना कितना कानूनी है?
गर्भवती महिलाओं और बच्चों को सड़क पर छोड़ना क्या मानवीय है?
अगर यही मकान किसी अमीर कॉलोनी में होते तो क्या ऐसी कार्रवाई होती?
दिल्ली में रह रहे नागरिकों की जिम्मेदारी किसकी है – यूपी सरकार या दिल्ली सरकार?
हमें क्या सीखना चाहिए?
यह मामला सिखाता है कि सिर्फ आधार या वोटर कार्ड होना सुरक्षा की गारंटी नहीं है। गरीब होना आज भी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। अगर आज 300 घर चुपचाप सील हो गए, तो कल यह संख्या 3000 भी हो सकती है।
यह रिपोर्ट Rashi Update की ग्राउंड रिपोर्ट पर आधारित है, जहां हम ऐसे मुद्दे उठाते हैं जो आम लोगों की जिंदगी से सीधे जुड़े होते हैं।