अखिलेश का नया फरमान: मायावती पर टिप्पणी रोक | बिहार नतीजों से सपा की बेचैनी बढ़ी, 2027 की रणनीति तय
अखिलेश यादव का नया फरमान — मायावती पर कोई टिप्पणी नहीं
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पूरे विपक्ष को हिला दिया है, लेकिन सबसे ज्यादा बेचैनी यूपी की समाजवादी पार्टी में देखी जा रही है। इस बीच पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने प्रवक्ताओं को साफ आदेश दिए हैं कि बसपा और उसकी सुप्रीमो मायावती के खिलाफ कोई टिप्पणी न करें।
सूत्रों के अनुसार यह 2027 के लिए बनाई जा रही नई सोशल-सियासी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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बिहार चुनाव नतीजों से सपा की बढ़ी चिंता
बिहार चुनाव में यादव नेताओं की भारी हार ने सपा के भीतर सवाल खड़े कर दिए हैं।
2020 में बिहार विधानसभा में 55 यादव विधायक थे,
जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 28 रह गई।
यह गिरावट यूपी की राजनीति के लिए भी संकेत मानी जा रही है। सपा को डर है कि यदि यह ट्रेंड यूपी में दोहराया गया तो यादव प्रतिनिधित्व और वोट बेस दोनों पर असर पड़ेगा।
पार्टी कार्यकर्ताओं की चिंता यह भी है कि महिलाओं के वोट को साधने के लिए भाजपा यूपी में भी चुनाव से पहले कोई बड़ा कैश-बेनिफिट स्कीम (₹500 या ₹1000 योजना) न चला दे।
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सपा में पीडीए फॉर्मूले की नई धार
अखिलेश यादव 2022 चुनाव के तुरंत बाद से ही PDA (पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं।
2024 लोकसभा चुनाव में इस रणनीति का असर दिखा — यादव परिवार की सभी सीटें सपा के खाते में गईं।
सपा नेतृत्व मानता है कि सिर्फ यादव + मुस्लिम समीकरण से अब सत्ता में वापसी संभव नहीं। इसलिए 2027 के लिए पीडीए को नया आधार बनाया जा रहा है।
इसी रणनीति के तहत ही बसपा या मायावती पर हमला न करने की नीति अपनाई गई है, ताकि दलित वोट बैंक को नाराज़ न किया जाए।
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मुलायम परिवार का प्रभाव और आंकड़े
यूपी में आज भी मुलायम सिंह यादव परिवार का प्रभाव काफी व्यापक है—
5 सांसद
2 विधायक
विधानसभा में कुल 20 यादव विधायक (18 सपा के, 2 भाजपा)
2012 में सपा ने 224 सीटें जीतकर बहुमत की सरकार बनाई, लेकिन 2014 और 2019 के चुनावों में बड़े झटके लगे।
2024 में वापसी ने पार्टी को नई दिशा दी है।
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2027 की बड़ी रणनीति: कम यादव उम्मीदवार, अधिक दलित प्रतिनिधित्व
सपा सूत्रों के अनुसार, 2027 में यादव उम्मीदवारों की संख्या कम की जा सकती है, ताकि पीडीए फॉर्मूले के अनुसार दलित और अन्य पिछड़ी जातियों को अधिक प्रतिनिधित्व मिले।
2024 में आज़माया गया एक महत्वपूर्ण फॉर्मूला था—
जनरल सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारना।
यह फैजाबाद (अयोध्या) में सफल हुआ, जहां सपा ने 5 लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज की।
2027 में इस मॉडल को और अधिक सीटों पर लागू किया जा सकता है।
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दलित वोट बैंक पर सपा की खास नजर
राजनीति विशेषज्ञों का मानना है कि अखिलेश यादव समझ चुके हैं कि दलित वोट के बिना भाजपा को चुनौती देना मुश्किल है।
इसी कारण उन्होंने बसपा पर हमला रोकने और दलित समाज को साधने के लिए नरम नीति अपनाई है।
बसपा को अच्छे से जानने वाले सैयद कासिम के अनुसार,
“यह आदेश इसलिए दिया गया है ताकि दलित समाज में संदेश जाए कि सपा सम्मान की राजनीति कर रही है।”
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निष्कर्ष
बिहार चुनाव के नतीजों ने सपा की रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है।
मायावती पर टिप्पणी रोक
पीडीए को केंद्र
दलित उम्मीदवारों पर फोकस
यादव प्रतिनिधित्व सीमित रखना
ये सभी संकेत बताते हैं कि अखिलेश यादव 2027 के लिए बड़े बदलाव कर रहे हैं।